सिर्फ निःसंतान्ता ही नहीं, अशुक्राणुता के दुष्प्रभाव और भी हैं

यदि किसी पुरुष के एक बार के वीर्य पतन में 39 करोड़ से कम शुक्राणु मौजूद होते हैं तो यह उनके बिगड़े स्वास्थ्य की तरफ इशारा हो सकता है। एक स्वस्थ व्यक्ति के वीर्य में पाए जाने वाली शुक्राणुओं की संख्या के मुकाबले कम शुक्राणुओं की संख्या वाले पुरुष में यह कमी हृदय रोग, बिगड़ी हुई उपापचय  प्रक्रिया (मेटाबोलिज्म), घटे हुए बॉन मास की और संकेत कर सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रेसिका में कार्यरत इंडोक्रिनोलॉजी के प्रोफेसर अल्बर्ट फरलीन (एम.डी, पी.एच.डी.) का मानना है कि किसी पुरुष के शुक्र में मौजूद शुक्राणुओं की संख्या से उसके स्वास्थ्य के विषय में काफी जानकारी हासिल हो जाती है।


फेरलीन एवं उनके साथियों ने भावी कोहॉर्ट के विषय में शोध किया। इस शोध के तहत 5177 ऐसे पुरुष जो निःसंतानता से पीड़ित थे, उनके वीर्य का, उनके शरीर में मौजूद अनेक प्रकार के होर्मोन्स का आंकलन किया गया। साथ ही इनके अण्डकोषों का अल्ट्रासाउंड किया गया एवं उनके शरीर के ग्लूकोस एवं लिपिड उपापचय क्रिया के विषय में जाना गया और उसका आँकलन किया गया। पुरुषों में 10.5 nmol/L से कम मात्रा में यदि टेस्टोस्टेरोन पाया गया, तो इस स्थिति को हाइपोगोनाडिजम के नाम से जाना गया। हाइपोगोनाडिजम को हम शरीर मे ल्युशीनाइज़िंग हॉर्मोन की मात्रा  9.4 IU/L से कम होने की स्थिति भी मान सकते हैं। जिन पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या 10 करोड़ से कम थी, उनमे जेनेटिक टेस्टिंग की गई एवं जिन पुरुषों में हाइपोगोनाडिजम की शिकायत थी, उनमें डी. एक्स.ए नामक टेस्ट किया गया


जिन पुरुषों में स्वस्थ पुरुष (जिनमे शुक्राणुओं की संख्या या तो 39 करोड़ थी, या उससे अधिक हो) के मुकाबले काम शुक्राणु होते हैं, उनमें हाइपोगोनाडिजम होने का खतरा अन्य पुरुषों के मुकाबले 12 गुना ज्यादा होता है। कम शुक्राणुओं की संख्या वाले पुरुषों में हाइपोगोनाडिजम का खतरा 45 प्रतिशत पाया गया एवं सामान्य शुक्राणुओं की संख्या वाले पुरुषों में इसका खतरा 6 प्रतिशत पाया गया।हाइपोगोनाडिजम का सबसे अधिक खतरा उन पुरुषों में पाया गया, जिनमें 10 करोड़ से कम शुक्राणु थे, जीन्स में विकृति थी, कृपटोरशीडिज़्म आदि रोग थे। सामान्य शुक्राणुओं की संख्या वाले पुरुषों के मुकाबले कम शुक्राणुओं की संख्या वाले पुरुषों का बी.एम.आई अधिक पाया जाता है। उनकी कमर की परीधि अधिक होती है, सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर, एल.डी.एल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा भी अधिक होती है। हालाँकि इनमे बी.एम.डी. की मात्रा कम पाई गई एवं के ऐसे पुरुषों को ऑस्टियोपोरोसिस से पीड़ित पाया गया। 


फेरलीन का मानना था कि पुरुषों की संभोग शक्ति एवं यौन संबंधित स्वास्थ्य को केवल संतान उत्पत्ति के उद्देश्य से नहीं देखा जाना चाहिए। ज़्यादातर पुरुष जब ऐसी किसी समस्या से गुज़रते हैं, तब उनका इलाज सही ढंग से नहीं हो पाता, एवं मात्र उनके शुक्राणुओं की सँख्या के आधार पर उनके स्वास्थ्य का आँकलन कर लिया जाता है। एक कुशल चिकित्सक को एक पुरुष के सभी पहलुओं को ध्यान में रख कर उसकी चिकित्सा करनी चाहिए, जैसे मोटापा, मधुमेह (डाइबिटीज) आदि कोई रोग, अधिक कोलेस्ट्रॉल, अधिक ब्लड प्रेशर इत्यादि पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। कई पुरुषों पर इसके बेहद गंभीर प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। अतः कई पुरुषों के लिए यह जीवन मृत्यु का सवाल भी हो सकता है।

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