आयुर्वेद के सिद्धांत-2: सप्त धातु

शरीर को धारण करने के कारण इन्हें धातु कहते हैं, ये सात होती हैं। रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र इन का निर्माण और पोषण हमारे द्वारा खाये जाने वाले आहार से होता है। आहार से सबसे पहले रस का बनता है, फिर क्रमशः रक्त आदि धातुओं का निर्माण होता है, और सबसे अंत मे शुक्र का निर्माण होता है।


रस 

हम जो आहार ग्रहण करते हैं उसके पाचन के बाद सबसे पहले आहार रस का निर्माण होता है। यही रस पूरे शरीर को पोषण प्रदान करता है।

इसकी अधिकता होने पर अन्न से द्वेष, भारीपन

औऱ कमी से हृदय में पीड़ा, गले का सूखना, बार बार पानी पीना, और मीठी चीजें खाने की ईक्षा होती है।



रक्त

रक्त दूसरी धातु है, यह लगातार पूरे शरीर मे प्रवाहित होता रहता है। इसकी वृद्धि होने पर शरीर और नेत्र का वर्ण लाल होने लगता है, वातरक्त, गुल्म रोग होने की संभावना होती है। रक्त क्षय होने पर शिराओं का शिथिल और ठंडा होना, स्किन का रफ होना, व्यक्ति क्षीण दिखाई देता है।


मांस

मांस धातु का निर्माण रक्त धातु से होता है, यह शरीर को सुडौलता देती है। इसकी वृद्धि होने पर- भारीपन, जांघ, बाहु, पिंडलियों, कूल्हे में मांस की अधिकता होने लगती है। मांस क्षय होने पर धमनियों(आर्टरीज़) में शिथिलता, पैर की पिंडलियों का सूख जाना होने लगता है।


मेद

मेद धातु, मांस धातु से बनती है, इसकी अधिकता होने पर पेट, कमर पर मोटापा हो जाता है, शरीर मे दुर्गंध, और चिकनापन आने लगता है, थोड़ा परिश्रम करने से अधिक थकावट महसूस होती है। मेद क्षय होने पर प्लीहा वृद्धि (स्प्लीनोमिगेली), बॉडी में ड्राईनेस, जॉइंट्स में नम्बनेस होने लगते हैं।



अस्थि

अस्थि धातु शरीर को निश्चित आकार देती है, और मेद से बनती है। इसकी अधिकता से दाँत कुरूप हो जाते हैं, अस्थि के ऊपर दूसरी अस्थि बनने लगती है। अस्थि क्षय होने पर केश, नख, और दांत टूटने लगते हैं।


मज्जा

मज्जा का निर्माण अस्थि धातु से होता है इसकी अधिकता से नेत्रों और सभी अंगों में भारीपन होता है। मज्जा क्षय होने पर वीर्य की कमी, जोडों में टूटने सी पीड़ा, अस्थियों में शून्यता होने लगती है।


शुक्र

शुक्र सातवी धातु है, यह मज्जा धातु के पाक से बनती है, यह संतानोत्पत्ति की कारक है। इसकी अधिकता से वीर्य अधिक बनता है, और मनुष्य ओजस्वी होता है। शुक्र क्षय होने पर व्यक्ति में मैथुन शक्ति(सेक्स पावर) की कमी हों जाती है, लिंग और अंडकोषों में दर्द आदि होने लगते हैं।


मल

शरीर मे होने वाली जीवनीय क्रियाओं (मेटाबॉलिज्म) के फलस्वरूप अनेक तरह के ऐसे पदार्थ बनते हैं, जिनका शरीर मे रहना हानिकारक होता है। इन्हें ही मल(मेटाबोलिक वेस्ट) कहा जाता है। ये त्याज्य पदार्थ शरीर से बाहर निकाल दिए जाते हैं।

मल  तीन तरह के होते हैं।


मूत्र

पूरे शरीर से त्याज्य पदार्थ रक्त के साथ किडनी में पहुंचते हैं, जहाँ उन्हें फिल्टर करके मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। इसकी अधिकता होने पर बार बार पेशाब का आना, नाभि के निचले हिस्से में दर्द होता है। इसका क्षय होने पर- मूत्र की कमी हो जाती है , यूरीनरी ब्लैडर में सुई चुभने के समान दर्द  होता है।


पुरीष

ग्रहण किये गए भोजन के पाचन, और अवशोषण के बाद जो अवशेष भाग बाकी बचता है, उसे ही पुरीष कहते हैं, इसकी वृद्धि होने और पेट मे दर्द, गुड़गुड़ाहट होती है। पुरीष की कमी होने पर पसलियों में दर्द, पेट का सिकुड़ जाना, होता है|


स्वेद

बॉडी में बनने वाले मेटाबोलिक वेस्ट का एक हिस्सा त्वचा के असंख्य छेदों से पसीने के रूप में बाहर निकाल दिया जाता है, इसे स्वेद कहते हैं। इसकी वृद्धि होने पर शरीर मे दुर्गंध, और त्वचा में खुजली होने लगती है। स्वेद क्षय होने पर पसीना नहीं निकलता, त्वचा का रूखापन, रोमकूपों में जकड़ाहत होने लगती है।

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