आयुर्वेद के सिद्धांत-1: त्रिदोष क्या हैं?

निरोग और स्वस्थ जीवन हर एक मनुष्य की सबसे बड़ी अभिलाषा होती है, इसे पाने के लिए मानव सभ्यता ने सदियों से तरह तरह की कोशिशें की हैं। इन सभी के बीच आयुर्वेद एक चमकते सितारे की तरह है, आयुर्वेद को अपने जीवन मे लाने के लिए पहले इसको जानना समझना आवश्यक है। आइये आयुर्वेद के मूलभूत नियमों के बारे में जानते हैं।


पंच महाभूत

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश ये पांच तत्व पंच महाभूत कहलाते हैं। हमारी बॉडी, हमारी डाइट और चारों ओर के सभी जीवित और निर्जीव, चारों ओर की प्रकृति इन्हीं से मिलकर बने हुए हैं। 


वातावरण के बाद सबसे महत्वपूर्ण मानव शरीर है।

  "दोष धातु मलमूलं हि शरीरं" -(सु.सू. 15/3)

आयुर्वेद के अनुसार त्रिदोष, सात धातुएं, और तीन तरह के मल मिलकर मनुष्य के शरीर की रचना करते हैं।


त्रिदोष

वात, पित्त, कफ ये तीन मिलकर त्रिदोष कहलाते हैं। ये तीन ही हमारे जीवन की सभी तरह की गतिविधियों को संचालित करते हैं। अपनी सम अवस्था मे ये अति महत्वपूर्ण आधार स्तंभ हैं, लेकिन अगर किसी कारण से इनकी सम अवस्था बिगड़ जाती है, तो यही शरीर मे रोग पैदा कर देते हैं।

1- वात

तीनों दोषों में प्रथम और मुख्य दोष वात है। इसे वायु भी कहते हैं। वायु के गुण रुक्ष (ड्राई), शीत (कोल्ड), लघु(हल्का), चल(मोबाइल), खर( रफ) आदि हैं। शरीर मे सभी तरह की मूवमेंट जैसे चलना, श्वासं लेना, खाये हुए भोजन का लगातार आगे बढ़ते जाना, हार्ट का धड़कना, ब्लड का पूरे शरीर मे दौड़ते रहना वात के कारण ही होती है। वात पांच प्रकार का होता है, जो अलग अलग तरह के कार्यों पर नियंत्रण करता है| वैसे तो वात पूरे शरीर मे व्याप्त होता है, लेकिन नाभि से नीचे का भाग विशेष रूप से वात का स्थान होता है।

जीवन के आखिरी भाग (वृद्धावस्था), दिन व रात के आखिरी भाग और भोजन के पाचन की अंतिम अवस्था मे शरीर मे वात की प्रबलता रहती है।


प्रकोप के कारण-

बहुत ज्यादा एक्सरसाइज या मेहनत करने, लम्बे समय तक फास्टिंग करने, नेचर्स काल (टॉयलेट) को रोक कर रखने, छींक, खांसी, प्यास, नींद आदि को बलपूर्वक रोकने से, अधिक ठंडे वातावरण में रहने या ज्यादा ठंडी, रूखी, कसैली, और कड़वी चीजें खाने से, वात कुपित(विकृत) हो जाता है।

लक्षण-

वात के विकृत होने शुरुआत में वात के समान्य कामों में गड़बड़ी आने लगती है, अगर इस पर ध्यान न दिया जाए तो वातिक रोग होने लगते हैं। वात प्रकोप होने पर पेट का फूलना, जकड़ाहत, शरीर में कम्पन होना, सुई के समान चुभने वाली पीड़ा होना, भोजन का सही से पाचन ना होना, और मुंह का स्वाद कसैला महसूस होना, सिर के बाल समय से पहले झड़ना और गंजापन होना आदि लक्षण मिलते है |

2- पित्त

पित्त के मुख्य गुण उष्ण(हीट), तीक्ष्ण(शार्प), द्रव(लिक्विड), अम्ल(एसिडिक), कटु(चरपरा) होते है। इनके समान गुण वाले भोजन करने से यह प्रकुपित होता है, और विपरीत गुण वाले पदार्थों के प्रयोग से शांत होता है। पित्त भी पाँच प्रकार का होता है। इसका मुख्य स्थान हृदय से नाभि के बीच होता है।

पित्त के कार्य- बॉडी के टेम्परेचर को बनाये रखना, भोजन का पाचन करना, आखों में देखने की क्षमता, बुद्धि, आदि को  उत्तपन्न करना है। 


प्रकोप के कारण

ज्यादा चरपरा, गर्म, खट्टा, और नमक वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करने से, उपवास करने से, धूप में, गर्म वातावरण में रहने से, क्रोध करने से पित्त प्रकुपित होता है। इसके अलावा भोजन के पाचन की मध्यम अवस्था, जीवन की युवावस्था और दिन के दोपहर के समय, मध्यरात्रि में, पित्त प्रधान होता है।


लक्षण

पित्त प्रकुपित होने पर इसके कार्य डिस्टर्ब होने लगते हैं, बुखार होना, मुँह और बॉडी पर छाले, फोले निकलना, एसिडिटी, पसीना अधिक आना, आंखों के सामने अंधेरा छा जाना, बॉडी से दुर्गंध आना, घाव का जल्द पक जाना, सिर के बालों का समय से पहले सफेद हो जाना आदि लक्षण मिलते हैं।


कफ

कफ को सरल अर्थ में बॉडी में उपस्थित चिकने और लुब्रिकेशन वाले पदार्थ से तुलना कर सकते हैं।

इसके गुण गुरु (भारी), शीत(ठंडा), मृदु(सॉफ्ट), स्निग्ध(मॉश्चराइज), स्थिर(नॉन मोबाइल) हैं।

इसके समान गुण वाले पदार्थों के सेवन से कफ कुपित और विपरीत गुण वाले पदार्थों के सेवन से शांत होता है। कफ का मुख्य स्थान हृदय के ऊपरी भाग में होता है।

कफ पाँच प्रकार का होता है, और यह शरीर को धारण करता है, शरीर को बल देता है, पूरे शरीर का लुब्रिकेशन करता है, भोजन के पाचन में सहायता करता है,  बालों को घना काला और मजबूत बनाता है।


प्रकोप के कारण

अधिक- मीठे, चिकनाई वाले धी तेल युक्त भोजन, दूध और उससे बने पदार्थ रबड़ी मलाई, खीर आदि पकवान खाने, दिन में सोने से कफ प्रकुपित होता है। भोजन के पाचन की प्रथम अवस्था, दिन, रात्रि के शुरुआती भाग और बचपन मे शरीर में कफ प्रधान होता है।

लक्षण

कफ कुपित होने पर पेट भरा हुआ लगना, भूख न लगना, तंद्रा, शरीर में भारीपन, चिकनापन, आलस, मुँह का स्वाद मीठा सा लगना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।

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