स्कैल्प टैटू- गंजेपन को छिपाने और फैशनेबल दिखने का एक क्रिएटिव तरीका

बालों का झड़ना किसी भी व्यक्ति के लिए चिंता की बात होती है। परेशानी तब बढ़ जाती है जब धीरे-धीरे गंजापन शुरू हो जाता है। बाल अगर एक बार पूरी तरह झड़ जाएं, तो इन्हें प्राकृतिक तरीकों से दोबारा उगाना लगभग असंभव है। इसलिए युवावस्था में गंजापन व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से परेशान कर सकता है। हमारी सोसायटी गंजेपन को आसानी से नहीं स्वीकार कर पाती है। इसका उदाहरण आप ऐसे समझ सकते हैं कि फिल्मों में जहां कहीं भी किसी कुटिल, चालाक और स्वार्थी व्यक्ति की इमेज दिखानी हो, वहां कई बार अच्छे खासे बालों वाले एक्टर को भी 'गंजी चमकदार खोपड़ी' वाला दिखाया जाता है, जबकि हीरो के बाल हमेशा स्टाइलिश और घने दिखाए जाते हैं। लेकिन गंजापन कोई 'अभिशाप' नहीं है, जिसके लिए आप उम्रभर शर्मिंदा और लो-कॉन्फिडेंस महसूस करें। ये एक शारीरिक स्थिति है, जिसे आपको सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए। आजकल गंजेपन का एक बेहद क्रिएटिव समाधान प्रचलन में है- स्कैल्प टैटू। 

टैटू की शुरुआत वैसे तो त्वचा के दाग-धब्बों को छुपाने के लिए हुई थी, मगर बाद में जैसे-जैसे इसमें क्रिएटिविटी और आर्ट शामिल हुए, ये फैशन बनने लगा। स्कैल्प यानी खोपड़ी पर साधारण तरीकों से टैटू बनाना आसान नहीं होता क्योंकि स्कैल्प की त्वचा बहुत पतली और ऑयली होती है। इसलिए टैटू बनाने के बाद कई तरह के साइड इफेक्ट्स का खतरा बना रहता है। मगर स्कैल्प पर आजकल एक नए तकनीक से टैटू बनाए जा रहे हैं, जिसे माइक्रो-पिग्मेंटेशन या ट्राइको-पिग्मेंटेश कहते हैं।


माइक्रो-पिग्मेंटेशन/ट्राइको-पिग्मेंटेश


स्कैल्प पर टैटू बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली ये नई तकनीक, जिसे माइक्रो-पिग्मेंटेशन या ट्राइको-पिग्मेंटेश कहा जाता है, साधारण टैटू की तुलना में ज्यादा सुरक्षित और साइड इफेट्स रहित है। इस तकनीक से स्कैल्प की पतली और ऑयली त्वचा पर टैटू बनाने पर ब्लू स्पॉट्स या दूसरे साइड इफेक्ट्स देखने को नहीं मिलते हैं। इस नई तकनीक में बेहद महीन सुई की मदद से स्कैल्प की ऊपरी पर्त के नीचे रंगों को इम्प्लांट किया जाता है। इसलिए ये कोई मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं, बल्कि एक तरह का आर्ट है। इस आर्ट के लिए एक खास डिवाइस का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी मदद से टैटू मास्टर स्कैल्प की सतह पर टैटू या बाल बनाते हैं।

इसके परिणाम स्वरूप आपकी खोपड़ी के जिस हिस्से में बाल कम हैं या पूरी तरह झड़ चुके हैं, वहां भी बाल घने और खूबसूरत नजर आते हैं। इसकी मदद से आप अपनी हेयर लाइन को एडजस्ट कर सकते हैं और खोपड़ी के दाग-धब्बों या निशान को भी छिपा सकते हैं। हालांकि इसकी सलाह उन लोगों को नहीं दी जाती है, जिन्होंने हाल में ही हेयर ट्रांसप्लांट या सर्कुलर फेस-लिफ्ट कराया है।

कई बार माइक्रो पिग्मेंटेशन को भी लोग साधारण टैटू जैसा ही समझ लेते हैं। कुछ टैटू पार्लर्स तो अपनी सर्विसेज लिस्ट में भी इसे लिख देते हैं। मगर ये तकनीक आपको साधारण टैटू पार्लर्स में आमतौर पर नहीं मिलेगी, क्योंकि इसके एक्सपर्ट और मशीनें दोनों ही अलग होते हैं। साधारण टैटू मास्टर्स ट्राइको-पिग्मेंटेशन की तकनीक को नहीं जानते हैं। इसलिए वे साधारण मशीनों की मदद से ही त्वचा के ऊपर टैटू बनाकर आपसे पैसे ऐंठ लेते हैं। लेकिन ड्राई स्किन पर बनाए गए ऐसे टैटू बाद में खराब हो जाते हैं या अपना रंग बदल लेते हैं। साधारण पार्लर्स में पिग्मेंटेशन कराने से आपके हेयर फॉलिकल्स को भी नुकसान पहुंच सकता है। 


माइक्रो पिग्मेंटेशन के लिए स्पेशलिस्ट कैसे चुनें

माइक्रो-पिग्मेंटेशन साधारण टैटू मेकिंग से कई मामलों में अलग है, इसलिए इसकी सफलता के लिए आपको अच्छा स्पेशलिस्ट तलाशना चाहिए। आमतौर पर ट्राइकोलॉजी के स्पेशलिस्ट बालों की समस्याओं, फीचर्स और स्कैल्प के बारे में काफी साइंटिफिक और मेडिकल जानकारी रखते हैं, जबकि साधारण टैटू पार्लर के 'टैटू मास्टर्स' को इनका पता नहीं होता है। इसलिए अगर आप स्कैल्प पर टैटू बनवाने का सोच रहे हैं, तो आपको किसी ट्राईकोलॉजी स्पेशलिस्ट से ही ट्रीटमेंट कराना चाहिए। ऐसे प्रोफेशनल्स के पास ट्राइको-पिग्मेंटेशन के लिए ज्यादा बेहतर मशीनें, एक्सपीरियंस और ज्ञान होता है।

चूंकि इस तकनीक में हाथ के द्वारा ही पिग्मेंटेशन किया जाता है, इसलिए इस काम के लिए सधे हुए हाथों वाला अनुभवी व्यक्ति जरूरी है, जिसकी एक्यूरेसी और कॉन्फिडेंस दोनों अच्छे हों और जिसे थ्योरेटिकल ज्ञान भी हो, ताकि वो आपके स्कैल्प के नेचर को समझकर सही सलाह और ट्रीटमेंट दे। पिग्मेंटेशन से पहले आपको एक्सपर्ट की सलाह लेकर कुछ टेस्ट्स भी करवाने बहुत जरूरी हैं।

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