शिलाजं कटु तिक्तोष्णं कटुपाकं रसायनम्।                                                                                   छेदि योगवहं हन्ति कफ मेदोश्म शर्कराः।                                                                                       मूत्रकृर्च्छ् क्षयं श्वासं वात अर्शांसि च पाण्डुताम्।।                                                                           अपस्मारं तथोन्मादं शोथ कुष्ठ उदरकृमीन्।

भाव प्रकाश निघंटु, श्लोक-80, 81, 82, पेज- 736

शिलाजीत कटु तिक्त रस युक्त, उष्ण वीर्य, कटु पाकी, और रसायन है। यह मलों का छेदन करता है, योगवाही है, कफ, मेद, अश्मरी, शर्करा को नष्ट करता है। मूत्रकृच्छ, क्षय, श्वास, वातिक अर्श, पांडु रोग, अपस्मार, उन्माद, शोथ, कुष्ठ, उदर कृमि को भी दूर करता है।

कुदरत ने मनुष्यों को एक से बढ़कर एक बहुमूल्य उपहार दिए हैं। शिलाजीत उनके बीच में एक चमकदार सितारे की तरह है। इसे शैलेय, शैलधातुज, शिला स्वेद, शिला निर्यास, अश्मज मिनरल पिच, मिनरल वेक्स आदि नामों से भी जाना जाता है। शिलाजीत का उपयोग प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद में हजारों वर्षों से अनेक रोगों की चिकित्सा में और एक रसायन के रूप में होता रहा है। गर्मी के मौसम में जब सूर्य की तीव्र किरणें पर्वतों पर पड़ती हैं, तो इस उच्च ताप के कारण गोंद की तरह का एक तरल पदार्थ उनसे स्रवित होने लगता है सूखने पर यह काला कोलतार के जैसा हो जाता है। इसे ही शिलाजीत कहते हैं। आधुनिक मतानुसार शिलाजीत का निर्माण हिमालयी पर्वत क्षेत्र में कुछ खास तरह की वनस्पतियों पर माइक्रो ऑर्गेनिस्म की सैकड़ों वर्षों की प्रक्रिया के फलस्वरूप होता है।

शिलाजीत काले रंग के चमकीले, भंगुर पदार्थ के रूप में प्रप्त होता है, यह जल में घुलनशील होता है और तारों को छोड़ता है। यह सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र में प्राप्त होता है, खास तौर पर कश्मीर, गढ़वाल, अल्मोड़ा, भूटान, तिब्बत, गिलगिट, नेपाल में मिलता है। हिमालय के अलावा यह अफगानिस्तान, रूस एवं चिली के उत्तरी भाग में भी मिलता है।

संगठन

शिलाजीत एक मिनरल्स से भरपूर पदार्थ है। इसमें मुख्य रूप से ह्यूमिक तत्व होते हैं, और यह इसका 60 से 80 प्रतिशत भाग बनाते हैं। इन तत्वों में सबसे महत्वपूर्ण फ्लूविक एसिड होता है जो कि अत्यंत लाभदायक होता है। फ्लूविक एसिड एक एन्टी ऑक्सीडेंट, एन्टी एजिंग, मेमोरी इंहेन्सर का कार्य करता है। साथ ही रिसर्च से सामने आया है कि फ्लूविक एसिड, अल्ज़ाइमर्स डिजीज के एन्टी मॉलिक्यूल की तरह भी कार्य करता है। इसके अलावा शिलाजीत मे कुछ फैटी एसिड, रेसिन्स, गम्स, स्टिरोल, सुगंधित पदार्थ भी पाए जाते हैं। इसका संगठन अलग अलग स्थानों के अनुसार अलग अलग हो सकता है।

प्रकार

शिलाजीत जिन स्थानों से प्राप्त होता है, वहाँ उपस्थित अन्य धातुओं के अंशों के आधार पर शिलाजीत चार प्रकार का होता है।

1- स्वर्णगर्भ शिलाजीत- यह गुड़हल के पुष्प के समान रंग वाला मधुर, कटु, तिक्त रस एवं मधुर पाक वाला होता है, और यह शिलाजीत वात पित्त नाशक होता है।

2- रजतगर्भ शिलाजीत - रजत(चांदी) बहुल स्थानों से निकलने के कारण यह तिक्त रस और मधुर पाक युक्त होता है। इस शिलाजीत में कफ और पित्त शमन के गुण होते हैं।

3- ताम्रगर्भ शिलाजीत- ताम्र बहुल इलाकों से निकलने के कारण यह शिलाजीत तिक्त रस, तीक्ष्ण, उष्ण गुण युक्त होता है, बाहर से देखने पर नीलाभ वर्ण का होता है। ताम्र गर्भ शिलाजीत कफ नाशक गुण रखता है।

4- लौहगर्भ शिलाजीत-  लौह अयस्क युक्त स्थानों से निकला शिलाजीत तिक्त, लवण, और कषाय रस युक्त कटु विपाकी, शीतल गुरु गुण वाला होता है। इसका वर्ण काले रंग का होता है। यह शिलाजीत त्रिदोष शामक गुण रखता है, और अनुपान भेद से सभी तरह के रोगों में प्रयोग होता है।

शोधन

शिलाजीत प्राकृतिक वातावरण में मिलता है, जिसके कारण इसमे अनेक तरह के अवांछित मिट्टी, पत्थर आदि पदार्थ भी मिले रहते हैं। इन्हें अलग करके प्यूरिफिकेशन की प्रोसेस शिलाजीत का शोधन कहलाती है। किसी भी रूप में शिलाजीत का सेवन करने के पहले उसका शोधन आवश्यक होता है।

शोधन के लिए सामान्य शिलाजीत लेकर उसे पॉवडर करके गर्म पानी और त्रिफला कषाय में घोल देते हैं, फिर उस घोल को फिल्टर करके धूप में रख देते हैं। ऐसा करने से छने हुए घोल के ऊपर काले रंग की मलाई सी आने लगती है, जिसे अलग कर लेते हैं। इस क्रिया को 3 बार दोहराया जाता है जिससे शुद्ध शिलाजीत प्राप्त होता है।

मात्रा

शिलाजीत लिक्विड और पॉवडर के रूप में उपलब्ध होता है। लिक्विड के रूप में इसे एक चावल के बराबर दूध या पानी मे घोल कर एक से तीन बार तक दिन में लेना चाहिए। पॉवडर के रूप में शिलाजीत को 300 से 500 मिलिग्राम तक की मात्रा में दिन में एक से दो बार तक, चिकित्सक के परामर्श अनुसार ले सकते हैं।

उपयोग

शिलाजीत के विषय में आयुर्वेद के ग्रंथों में बताया गया है कि ऐसा कोई रोग नहीं है जिसे शिलाजीत नष्ट न कर सके, यह मनुष्य के सभी प्रकार के रोगों में लाभदायक है। विशेष रूप से शिलाजीत एक रसायन या रिजुविनेटर का काम करता है। इसके साथ साथ यह अल्ज़ाइमर्स डिजीज, डाइबिटीज, ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज, एनीमिया आदि में भी लाभदायक है।

Medically reviewed by Rishabh Verma, RP

shilajit